Baba Baijnath Dham : जानें क्या हैं बाबा बैजनाथ धाम का महत्व, जहां लाखों श्रद्धालु नंगे पैर पहुंचते है दर्शन के लिए…

 

Baba Baijnath Dham

 

नई दिल्ली, Baba Baijnath Dham : सावन के हर एक दिन का मजबूत महत्व होता है, शिव भक्त हर महादेव के दर्शन मात्र के लिए दूर-दूर से आते है, वही सावन में झारखण्ड के देवघर में लाखों की संख्या में भक्त कई किलो मीटर पैदल व नंगे पैर चल कर उनको गंगा जल चढाने और उनके दर्शन के लिए आते है. बाबा बैद्यनाथ प्रसिद्ध तीर्थस्थलों और 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है. इसे भगवान शिव का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है. ये एक ज्योतिर्लिंग है, जो शक्तिपीठ भी है. मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान विष्णु ने की थी.

बाबा बैद्यनाथ धाम का महत्व-

मान्यता है कि इस मंदिर में आने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इसलिए मंदिर में स्थापित शिवलिंग को कामना लिंग के नाम से भी जाना जाता है. ये लिंग रावण की भक्ति का प्रतीक है. इस जगह को लोग बाबा बैजनाथ धाम के नाम से भी जानते हैं. सावन में इस जगह का खास महत्व होता है. पूरे एक महीने तक यहां श्रावणी मेला लगता है. सावन के महीने में दूर-दूर से लोग कांवड़ लेकर बाबा के धाम पहुंचते हैं और गंगा जल चढ़ाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.

 

 

 

बाबा बैद्यनाथ धाम की कथा-

भगवान शिव के भक्त रावण और बाबा बैजनाथ की कहानी बड़ी निराली है. पौराणिक कथा के अनुसार दशानन रावण भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए हिमालय पर तप कर रहा था. वह एक-एक करके अपने सिर काटकर शिवलिंग पर चढ़ा रहा था. 9 सिर चढ़ाने के बाद जब रावण 10वां सिर काटने वाला था तो भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए और उससे वर मांगने को कहा.

तब रावण ने ‘कामना लिंग’ को ही लंका ले जाने का वरदान मांग लिया. रावण के पास सोने की लंका के अलावा तीनों लोकों में शासन करने की शक्ति तो थी ही साथ ही उसने कई देवता, यक्ष और गंधर्वो को कैद कर के भी लंका में रखा हुआ था. इस वजह से रावण ने ये इच्छा जताई कि भगवान शिव कैलाश को छोड़ लंका में रहें. महादेव ने उसकी इस मनोकामना को पूरा तो किया पर साथ ही एक शर्त भी रखी. उन्होंने कहा कि अगर तुमने शिवलिंग को रास्ते में कही भी रखा तो मैं फिर वहीं रह जाऊंगा और नहीं उठूंगा. रावण ने शर्त मान ली.

 

 

 

इधर भगवान शिव की कैलाश छोड़ने की बात सुनते ही सभी देवता चिंतित हो गए. इस समस्या के समाधान के लिए सभी भगवान विष्णु के पास गए. तब श्री हरि ने लीला रची. भगवान विष्णु ने वरुण देव को आचमन के जरिए रावण के पेट में घुसने को कहा. इसलिए जब रावण आचमन करके शिवलिंग को लेकर श्रीलंका की ओर चला तो देवघर के पास उसे लघुशंका लगी.

ऐसे में रावण एक ग्वाले को शिवलिंग देकर लघुशंका करने चला गया. कहते हैं उस बैजू नाम के ग्वाले के रूप में भगवान विष्णु थे. इस वजह से भी यह तीर्थ स्थान बैजनाथ धाम और रावणेश्वर धाम दोनों नामों से विख्यात है. पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक रावण कई घंटो तक लघुशंका करता रहा जो आज भी एक तालाब के रूप में देवघर में है. इधर बैजू ने शिवलिंग को धरती पर रखकर इसे स्थापित कर दिया.

 

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जब रावण लौट कर आया तो लाख कोशिश के बाद भी शिवलिंग को उठा नहीं पाया. तब उसे भी भगवान की यह लीला समझ में आ गई और वह क्रोधित शिवलिंग पर अपना अंगूठा गढ़ाकर चला गया. उसके बाद ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की पूजा की. शिवजी का दर्शन होते ही सभी देवी देवताओं ने शिवलिंग की उसी स्थान पर स्थापना कर दी और शिव-स्तुति करके वापस स्वर्ग को चले गए. तभी से महादेव ‘कामना लिंग’ के रूप में देवघर में विराजते हैं.

 

 

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