Exclusive : छत्तीसगढ़िया संस्कारों के शुभचिंतक ‘मीर अली मीर’ से खास बातचीत, कहा-विलुप्त हो रही संस्कृति को है सहेजने की जरुरत

 

रायपुर। Exclusive नंदा जाही का रहे …नंदा जाही का… इहा ज्यादा झन सकेल, कहीं संघेरे नई रहय, कोनो संग ल नई धरय, तोर कनिहा के करधन ल काट दारही, सउघेय पुतरी और केनवा ल बाट दारहीं…जैसे गीतों में प्रदेश के विलुप्त हो रही परंपराओं व संस्कारों की चिंतन साफ झलक रही है। रिश्तों-नातों के बीच बढ़ रही दूरियां व टेक्नालॉजी में खोते लोगों को पुनः सोचने के लिए विवश किया है। छत्तीसगढ़ के संस्कारों व परंपराओं के शुभचिंतक ‘मीर अली मीर’ आज टीसीपी 24 न्यूज के दफ्तर पहुंचे।

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उन्होंने टीसीपी 24 न्यूज से साझा करते हुए कहा कि बचपन से लिखने-पढ़ने का शौक था। स्कूली शिक्षा के दौरान उनके शिक्षक ने उन्हें कविता पाठ करने का अवसर दिया, जिसमें उन्होंने महाराणा प्रताप के ओज भरे कविता पाठ किया। जिसमें रंच मात्र धरती भी देना नहीं हमें स्वीकार…भारत का हर वीर सिपाही है पत्थर का दीवार… कहकर सुनाया। यहीं से इनके कविता का सफर शुरू हुआ जो आज पर्यंत तक चल ही रहा है।

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‘मीर अली मीर’ ने अपने सबसे प्रसिद्ध गीत नंदा जाही का रहे …नंदा जाही का…को विधानसभा में मुख्यमंत्री व सभी मंत्रीमंडल की उपस्थिति में पेश किया था। जहां उपस्थित भीड़ की तालियों की गड़गड़ाहट जो उस दिन से बज रही है आज तक बज ही रही है। ‘मीर अली मीर’ का जादू जिसे एक बार चढ़ गया उसे कभी नहीं उतरता है।

आपको बता दें कि हाल में आयी छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘भूलन द मेज’ में मीर अली मीर के गीत नंदा जाही का रहे… नंदा जाही का…को शामिल किया गया है। जिसे लोगों के द्वारा खूब पसंद किया जा रहा है।

आपको बता दें कि बात जब चिंतन की आती है तब मीर अली मीर का नाम सबसे पहले क्रम में आता है। इनके गीतों में छत्तीसगढ़ी संस्कृति और संस्कारों की झलक दिखाई देती है। उन्होंने अपने गीत के माध्यम से गांव की महिलाओं की दैनिक कर्म बखूबी ही प्रस्तुत किया है। ग्रामीण महिलाएं गोबर को कैसे सहेजती हैं उसे इस कविता के माध्यम से दिखाया गया है। खादर छानी…माटी के भिथिया गोबर पानी म लिपाय….।

टीसीपी 24 न्यूज से चर्चा में मीर अली मीर ने कहा कि जब भी मैं कविता का रचना करता हूं तो उसमें पूरा संसार दिखता है। पूरे समाज का चिंतन होता है। जो दिखता है वहीं मेरा कविता होता है।

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उन्होंने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा जब छत्तीसगढ़ की स्थापना के बाद मुख्यमंत्री के तौर अजीत जोगी शपथ ले रहे थे। तब घड़ी चौक के भारी जनसुमदाय के बीच से अमावस के देहरी में दिया कस अंजोर… का मंचन किया। हाल में पूरे प्रदेश में भूपेश बघेल के नेतृत्व में बोरे बासी खाया गया। जिसे प्रदेश में तिहार के रूप में हाथों हाथ लिया गया। इस पर भी मीर अली मीर के द्वारा गीत की प्रस्तुति इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय परिसर में किया गया।

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आज उन्होंने टीसीपी 24 न्यूज के दफ्तर में बेटी बचाने का संदेश देते हुए गीत प्रस्तुत किया। जो उनके चुने हुए गीतों में से एक है। बिना अवतरे कोख मा झन बुजावय ककरो बेटी झन गंवावय…। वहीं उन्होंने पलायन की चिंता को लेकर कविता के माध्यम से बताया कि जिसमें पत्नी अपने पति के इंतजार में बैठी रहती है। वहीं अंतिम कविता में व्यक्ति के अंत के बारे में बताया, जिसमें इंहा ज्यादा झन सकेल, कोनो ल ज्यादा संघेर…. गाते हुए कार्यक्रम का समापन किया। मीर अली साहब ने लोगों से आह्वान किया है कि वे अपनी संस्कृति और भाषा को कभी न भुलें और जागरूक बनें रहें।

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