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देवउठनी एकादशी आज:तुलसी विवाह के मुहूर्त और विधि, अब चातुर्मास खत्म होने से शुरू होंगी शादियां, जानिए इस साल के विवाह मुहूर्त..

Mahendra Kumar SahuNovember 15, 20211min


रायपुर।  इस बार देव प्रबोधिनी और तुलसी विवाह दो दिन 14 और 15 नवंबर  को मनाया जा रहा है। ऐसा पंचांगों में तिथियों की गणना में भेद होने की वजह हो रहा है। ये तिथि खास इसलिए है क्योंकि पद्म और विष्णुधर्मोत्तर पुराण के मुताबिक इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं। इसी के साथ तप और नियम-संयम से रहने का चातुर्मास भी खत्म होता है। इस दिन से ही शादियां और गृह-प्रवेश जैसे मांगलिक कामों की शुरुआत हो जाती है। इस दिन शाम को भगवान विष्णु का शालग्राम के रूप में तुलसी के साथ विवाह करवाने की भी परंपरा है।

 

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15 नवंबर को मनाएं एकादशी

अखिल भारतीय विद्वत परिषद के साथ ही पुरी, उज्जैन और बनारस के ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि एकादशी तिथि 14 नवंबर को सुबह तकरीबन 8.34 से शुरू हो रही है और अगले दिन सुबह 8.26 तक रहेगी। 15 नवंबर को सूर्योदय के वक्त एकादशी तिथि होने से इसी दिन देवप्रोधिनी और तुलसी विवाह पर्व मनाया जाना चाहिए। सूर्योदय व्यापिनी तिथि के इस सिद्धांत का जिक्र निर्णयसिंधु, वशिष्ठ स्मृति और अन्य ग्रंथों में किया गया है।

तुलसी विवाह/पूजा विधि और शुभ मुहुर्त

शाम 5:15 से 6:50 बजे तक पूजा के लिए उत्तम समय है। इसकी पूजा विधि बहुत ही सहज है। इसे निम्न बिंदुओं में समझें –
1. तुलसी के गमले को सजाएं और उसके चारों ओर गन्ने का मंडप बनाएं, उस पर सुहाग का प्रतीक चुनरी ओढ़ाएं।
2. गमले को साड़ी में लपेटकर तुलसी को चूड़ी पहनाकर श्रृंगार करें।
3. गणेश जी सहित भगवान शालिग्राम और तुलसी की पूजा करें। नारियल पर दक्षिणा चढ़ाएं।
4. भगवान शालिग्राम की मुर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसी की सात बार परिक्रमा करें।
5. धूप-दीप के बाद आरती करें और विवाह के मंगल गीत गाएं।

 

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इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में तीर्थ स्नान कर के शंख और घंटा बजाकर मंत्र बोलते हुए भगवान विष्णु को जगाते हैं। फिर उनकी पूजा करते हैं। शाम को गोधूलि वेला यानी सूर्यास्त के वक्त भगवान शालग्राम और तुलसी का विवाह करवाया जाता है। साथ ही घरों और मंदिरों में दीपदान किया जाता है।

शिव पुराण: चार महीने योग निद्रा से जागते हैं भगवान विष्णु

शिव पुराण के मुताबिक, भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु ने दैत्य शंखासुर को मारा था। भगवान विष्णु और दैत्य शंखासुर के बीच युद्ध लंबे समय तक चलता रहा। युद्ध समाप्त होने के बाद भगवान विष्णु बहुत अधिक थक गए। तब वे क्षीर सागर में आकर सो गए। उन्होंने सृष्टि का कार्यभार भगवान शिव को सौंप दिया। इसके बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागे। तब शिवजी सहित सभी देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु की पूजा की और वापस सृष्टि का कार्यभार उन्हें सौंप दिया। इसी वजह से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है।

इस दिन तुलसी विवाह की भी परंपरा है। भगवान शालग्राम के साथ तुलसी जी का विवाह होता है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है, जिसमें जालंधर को हराने के लिए भगवान विष्णु ने वृंदा नामक अपनी भक्त के साथ छल किया था। इसके बाद वृंदा ने विष्णु जी को श्राप देकर पत्थर का बना दिया था, लेकिन लक्ष्मी माता की विनती के बाद उन्हें वापस सही करके सती हो गई थीं। उनकी राख से ही तुलसी के पौधे का जन्म हुआ और उनके साथ शालग्राम के विवाह का चलन शुरू हुआ।

 


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