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EXCLUSIVE: केटीयू में यूजीसी के नियमों की उड़ाई जा रही धज्जियां, कटघरे में कुलपति!, बिना जांच के बांट दी पीएचडी की डिग्री!, बलदेव भाई शर्मा ‘संघ’ के हैं करीबी

Som dewanganJuly 14, 20211min


 

स्नेहिल सराफ, रायपुर। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में यूजीसी के नियमों की धजिज्यां उड़ाई जारी है। इतना ही नहीं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देशों को ताक में रखकर कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में शोधकार्य करवाया जा रहा है। ऐसे में अब कुलपति बलदेव भाई शर्मा पर कई तरह के बड़े सवाल उठ रहे हैं। साथ ही कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय की विश्वनियता पर भी प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं। वहीं यहां से पासआउट होने वाले छात्रों के भविष्य पर तलवार लटकती दिख रही है।

 

बता दें कि कुलपति बलदेव भाई शर्मा शुरू से ही विवादोें में रहे हैं। पदभार के दौरान भी काफी विरोध का सामना करना पड़ा था। विवाद का एक कारण यह भी रहा है कि बलदेव भाई शर्मा संघ से जुडेÞ हुए हैं। जिसका प्रदेश के कई संगठनों व राजनीति दलों द्वारा विरोध किया जाता रहा है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को लेकर विवाद इतने में ही खत्म नहीं होता है। यहां कई प्रोफेसरों के फर्जी नियुक्ति का मामला भी लगातार सुर्खियों में रहता है। अपने राजनीतिक रसूख के चलते ये प्रोफेसर नामचीन बने बैठे हैं।

 

-क्या है यूजीसी का नियम


 

यूजीसी के अनुसार शोधार्थी की पीएचडी कोर्स वर्क में उपस्थिति अनिवार्य है, जबकि विश्वविद्यालय द्वारा उपस्थिति व प्लैगेरिजम प्रमाणीकरण बिना आदेश की सबसे बड़ी डिग्री पीएचडी बांट दी गई। विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड जांच कर इनकी पुष्टि की जा सकती है।

 

-नियमों की अनदेखी


 

यूजीसी के एमफिल/पीएचडी अधिनियम 2009 नियमानुसार कोई भी नियमित शोधार्थी अपने शोध कार्य के दौरान किसी अन्य संस्था चाहें वह सरकारी हो या गैर सरकारी का नियमित वेतन भोगी नहीं हो सकता। विश्वविद्यालय के सत्र 2010 में पंजीकृत शोधार्थियों द्वारा यूजीसी के इस नियम को भी पूरी तरह अनदेखा किया गया है। नियमित शोधकार्य के साथ उम्मीदवार प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के मुख्य पदों में नियमित वेतनभोगी रहें जिसकी जानकारी शोध निर्देशक को भी रही, किन्तु उनके द्वारा शोधार्थियों को विशेष छुट प्रदान करते हुए पीएचडी अवार्ड करवा दी गईं।

 

-30 छात्रों को कराई गई एमफिल


 

यूजीसी के नियमों की अनदेखी का सिलसिला केवल पीएचडी तक नहीं रहा बल्कि विश्वविद्यालय में होने वाले एमफिल पाठ्यक्रम में भी अधिनियम 2009 की धज्जियां उड़ाई गई। जिसमें नियमों को मजाक बनाते हुए सत्र 2015-16 में एक साथ 30 छात्रों को एक एसोसिएट प्रोफेसर एवं एक सहायक प्रोफेसर द्वारा एमफिल कराई गई।

 

-नियमों को ताक में रखकर एमफिल की डिग्री जारी की


 

विश्वविद्यालय के एमफिल सत्र 2013 में पंजीकृत शोधार्थी भी पीएचडी शोधार्थियों की तरह विभिन्न संस्थानों में नियमित, वेतनभोगी कार्यरत रह कर यूजीसी के अधिनियम 2009 का उल्लंघन करते हुए एमफिल की डिग्री जारी की गई। वर्तमान में सत्र 2013 में पंजीकृत 6 शोधार्थियों को इन्हीं विसंगतियों के साथ पीएचडी अवार्ड करने की तैयारी की जा रही।

 

 

विश्वविद्यालय द्वारा पूर्व व वर्तमान में किए जा रहे शोध कार्यों एमफिल / पीएचडी में यूजीसी नियमों द्वारा प्रवेश में आरक्षण नियमों का पालन, कोर्स वर्क में उपस्थिति कार्यरत उम्मीदवारों से अनापत्ति प्रमाणपत्र, प्लैगेरिजम से सम्बंधित प्रमाण पत्र, शोध डिग्रीयों के यूजीसी नियमानुसार जारी होने का प्रमाण पत्र, पंजीयन व पुनर पंजीयन में अनियमितता, शोध निदेशक के साथ 200 दिनों की उपस्थिति, छमाहि प्रगति प्रतिवेदन, शोध पत्र प्रकाशन जैसे नियमों की जांच कर आवश्यक कार्यवाही के लिए निवेदन प्रस्तुत है। इसी तरह की शिकायतों पर राजभवन द्वारा संज्ञान लेकर तत्काल कार्यवाही करते हुए डिग्रीयां निरस्त की गई हैं, वर्तमान शिकायत में भी जांच एवं तथ्य पाये जाने पर बिना भेदभाव समान कार्यवाही अपेक्षित है।

 

छात्र नेताओं ने भी लगाए गंभीर आरोप


 

बलदेव भाई शर्मा ने जब से कुलपति का पद संभाला है, तब से ही छात्र उन पर संघ की विचारधारा के प्रचार-प्रसार को आगे बढ़ाने का आरोप लगा रहे है। इस मुद्दे को लेकर एनएसयूआई नेता हनी बग्गा और तुषार गुहा ने भी कुछ महीनों पहले प्रदर्शन किया था। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय को संघ की राजनीति का अड्डा बना रहे है। कुलपति और सिर्फ अपने कमरे में बैठे आराम फरमा रहे है, ना ही छात्रों से मिलते है ना ही विश्वविद्यालय की परेशानियों को सुनते है। ऐसे कुलपति से विश्वविद्यालय का भविष्य गर्त में चला जाएगा।

 

-छात्रों से भेदभाव


 

“छात्रों से मिलने में भेदभाव और सिर्फ एबीवीपी के छात्रों की बात सुनते है, न ही हमारी किसी समस्या को सुनने की कोशिश करते है। छात्रों के भविष्य से इनका ध्यान कोसो दूर है।

-हनी परमीत बग्गा


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