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बेरोजगार होते युवाओं के मन में उठ रहे गंभीर सवाल, प्राणवायु साबित होती पुरातन जीवनशैली

Mahendra Kumar SahuMay 10, 20211min


 

महेंद्र साहू: जिस तरह देश कोरोना महामहारी से जूझ रही है। और आर्थिक तंगी का सामना कर रही है। कहीं न कहीं हम अपने पुरातन अर्थव्यवस्था की ओर झांकने में मजबूर हैं। इसके सिवाय हमारे पास और कोई ऑप्शन नहीं है, अगर हम 100 दशक पूर्व की जीवन शैली की ओर देखेंगे तो हमें पता चलेगा कि उस दौर के लोग सुखी, स्वस्थ व दीघार्यु थे। जबकि आज कि भागम-भाग भरी जीवन शैली में ऐसा कुछ भी नहीं है। कहने को तो हमारे पास एसी, कुलर, पंखे, रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन, मोटर साइकिल, कार, हवाई जहाज, सिमेंट व कांक्रीट की पक्के मकान है लेकिन इन पक्के मकानों में नींद नहीं है। आपा धापी भरी जीवन शैली में कुछ और पाने की चाह ने हमें न जानें कितना पीछे धकेल दिया है हमें खुद को याद नहीं रहा।

 

 

विकास के नाम पर न जानें हम और कितना विनाश करते जाएंगे। एक समय था जब हमें वनों से बड़े पैमाने पर लघु वनोपज प्राप्त होता था। ग्रामीण जन-जीवन बड़ा सीधा सरल हुआ करता था। लोगों को कुछ और ज्यादा की लालच नहीं थी, जिसके चलते वे सुखी व स्वस्थ जीवन शैली का निर्वाह करते थे। लोगों के जीवन में जैसे-जैसे आधुनिकता घर करते गई। लोग मृग तृष्णा के पीछे भागते जा रहे हैं। जिसका कोई अंत नहीं है।

 

 

कोरोना रूपी महामारी ने लगभग सब कुछ खत्म कर दिया है। लोग अपने आप को असहाय महसूस करने लगे हैं। देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। ऐसे समय में जब कमजोर वर्ग टक-टकी लगाए देख रहा है कि कब कोई हाथ मदद के लिए बढ़ेगा। वहीं राज्य व केन्द्र सरकारों की बजट छोटी हो गई है। ऐसे समय में एकजुट होकर कार्य करने के बजाय राजनीति के ठेकेदार एक-दूसरे को कोसने में लगे हुए हैं।

 

प्राइवेट सेक्टरों से बेरोजगार होते युवाओं के मन में अब निराशा की लकीरें साफ दिखाई दे रही है। और मन में बड़ा सवाल उठ रहा है। जो उन्हें गांवों की ओर वापस लौटने के लिए बार-बार प्रेरित कर रहा है।

 

देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का एकमात्र साधन परंपरागत खेती हो सकती है। कुछ दशक पहले युवा खेती से पीछा छुड़ाकर शहरों की ओर भाग रहे थे। मानों आपदा ने लोगों को सीखा दिया कि प्रकृति और ग्रामीण जीवनशैली को छोड़कर आप कहीं भाग नहीं सकते हैं। धर्म ग्रंथों में प्रकृति के महत्व व उससे जुड़े रहने के संकेत भी मिलते रहे हैं। जो लोगों को जीव से जीव को प्रेम करना सिखाती है।

 

आज के दौर में भी परंपरागत खेती व पर्यावरण को सहेज कर स्वस्थ व सुखमय जीवन प्राप्त किया जा सकता है। अंधा-धुंध पेड़ों की कटाई के चलते लोगों के लिए प्राणवायु की कमी होती जा रही है। ऊंची-ऊंची फैक्ट्रियों से निकलने वाली जरहीली गैसें स्वस्थ्य जीवन के लिए घातक सिद्ध हो रही है। ऐसे में हमें अपने पर्यावरण को सहेज कर स्वस्थ्य व दीघार्यु जीवन प्राप्त करना होगा। साथ ही यह काल के गाल समा रहे लोगों को बचाने का अच्छा जरिया भी सिद्ध हो सकता है।

 


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